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Tuesday, 11 October 2016

फैसला


करवटें बदलते हुए न जाने कितनी देर हो गई परंतु नियति की आँखों में नींद का नामोंनिशान न था, गली में जल रही स्ट्रीट लाइट का प्रकाश बंद खिड़की के शीशे से छनकर कमरे में एक जीरो वॉट के बल्ब जितनी रोशनी फैला रहा था इसलिए उसने बिना लैंप जलाए हाथ बढ़ाकर बेड के साइड में रखे टेबल पर से अपना मोबाइल उठाया और समय देखा तो दो बजकर दस मिनट हो रहे थे। वह फिर से सोने का प्रयास करने लगी.....
लेकिन जैसे ही वह सोने के लिए आँखें बंद करती उसकी आँखों के समक्ष विभोर का मुर्झाया हुआ चेहरा घूम जाता..... कितना कमजोर हो गया है वो, अपनी उम्र से दस-पंद्रह साल बड़ा लगता है। पाँच सालों के बाद आज अचानक हॉस्पिटल में उससे मुलाकात हो गई.....वह अपनी माँ को देखने अस्पताल में आया हुआ था और नियति अपने पड़ोस में रहने वाली शिखा के साथ उसके कुछ टेस्ट करवाने आई थी......
कैसी हो......
अचानक जानी- पहचानी सी आवाज सुनकर वह सन्न रह गई....उसका दिल जोर-जोर से धड़कने लगा.....
यह....यह तो विभोर की आवाज है, अपने-आप को संयत करते हुए वह पीछे को मुड़ी...सचमुच यह विभोर ही था। बाल पहले से थोड़े हल्के हो गए थे,  सफेदी आ जाने से बाल और दाढ़ी खिचड़ी से हो गए थे।
मैं ठीक हूँ....पर तुम.....अपना ध्यान नही रखते क्या... ये क्या हाल बना लिया है....खुद को संभालते हुए नियति बोली।
किसके लिए ध्यान रखूँ.....लंबी सी साँस छोड़ के हुए विभोर बोला।
क्यों परिवार नहीं है...उनके लिए रखो। नियति ने व्यंग्य पूर्ण लहजे में कहा।
मेरा परिवार तो तुम और मेरे बच्चे हैं, जो मुझसे दूर रहते हैं....मुझे कोई खुशी ही नहीं होती....कोई ख्वाहिश भी नहीं बची तो अब किसको लिए..... कहते-कहते विभोर चुप हो गया।
तुम अपने घर मेरा मतलब भाई-बहन के साथ नहीं रहते? नियति ने कहा, उसे स्वयं की आवाज गहराई से आती हुई प्रतीत हो रही थी।
मैंने कभी कहा था क्या कि मैं कभी उनके साथ रहूँगा.. तुम मुझे समझ ही नहीं पाईं.....खैर...मम्मी बीमार हैं, यहाँ भर्ती हैं, उन्हें ही देखने आया था। जब से तुम मुझे छोड़कर गईं मैं घर वालों के किसी आयोजन में नहीं गया....आज भी तुम्हारा इंतजार कर रहा हूँ....चलता हूँ....कहते हुए विभोर सीढ़ियों की ओर चल दिया। नियति स्तब्ध सी मूक अवस्था में उसे जाते हुए तब तक देखती रही जब-तक उसकी परछाई भी ओझल नहीं हो गई।
जब से वह अस्पताल से वापस आई है उसके दिलो-दिमाग से विभोर की वह मुरझाई छवि हटती ही नहीं....पाँच साल हो गए परंतु उसकी यादें आज भी उसे उतनी ही टीस देती हैं, उसे ऐसा लगा जैसे अभी कल ही की तो बात है.............
उसने कहा कि "मुझे ऐसा लगा कि मेरे आने से तुम दोनों भाइयों को बाधा महसूस हुई हो" तो तुरंत विभोर ने कहा- "हाँ तुमने हमें डिस्टर्ब किया, हम भाइयों के बीच कोई पर्सनल बातें हो रही थीं और तुम वहाँ भी आ गईं।" यह सुनते ही नियति को ऐसा लगा मानो विभोर ने उसके गाल पर जोरदार थप्पड़ जड़ दिया हो। बच्चों के सामने न जाने क्यों उसने स्वयं को बहुत अपमानित सा महसूस किया। उसकी आँखें भर आईं, बच्चे देख न लें इसलिए वह कमरे में चली गई और जब अपने आप को पूरी तरह सामान्य कर लिया तब कमरे से बाहर आकर सोफे पर बैठकर चुपचाप टी०वी० प्रोग्राम देखने लगी थी। किन्तु वह देख रही थी कि विभोर को जरा भी परवाह नहीं कि उसकी पत्नी को उसकी बातों से कितना दुख हुआ है.....
अक्सर लोग बातें करते हैं कि पति-पत्नी का रिश्ता बड़ा पवित्र होता, पत्नी अर्धांगिनी होती है, परंतु क्या यह संभव है कि शरीर का आधा अंग जो करे दूसरे आधे अंग को पता ही न चले?? पर ईश्वर ने नियति के साथ मजाक किया वह किसी भी रिश्ते से कभी जुड़ ही न सकी या यूँ कहे कि उसे जोड़ा ही नहीं गया। दस वर्ष हो चुके नियति और विभोर की शादी को किंतु आज भी वह इस घर का हिस्सा न बन सकी और दुख तो असहनीय तब हो जाता है जब वह यह महसूस करती है कि मायके में भी वह अब महज मेहमान होती है, यानि अब वह न ससुराल पर अधिकार जता सकती है और न ही मायके पर.....
उसका मन कर रहा था कि वह जोर-जोर से रोये ताकि उसका मन हल्का हो सके किंतु वह ऐसा भी नहीं कर सकती थी क्योंकि बच्चे परेशान हो जाते.....अब तो बस रह-रह कर यही सवाल उसे परेशान कर रहा था कि क्या बेटी होना गुनाह है? क्या बेटियों का स्वयं का कोई घर नहीं होता?? क्यों वह जिस परिवार को अपना पूरा जीवन समर्पित कर देती है, उसी परिवार की वह कभी अपनी नहीं हो पाती?? क्यों सदैव उसे यह अहसास कराया जाता है कि वह बाहर की है..... नियति तो संयुक्त परिवार में भी नहीं रहती। वह, विभोर और उनके दोनों बच्चे बस...... फिरभी जब कभी भी उसके ससुराल से कोई भी आता है तो विभोर उनसे कुछ देर अकेले में बातें जरूर करता है, कभी-कभी जब घर से किसी का फोन आता है तब भी वह उठकर अलग कमरे में चला जाता है ताकि नियति को पता न चल सके.....
जब तक विभोर के घरवाले नहीं होते तब तक नियति विभोर की अपनी पत्नी यानि अर्धांगिनी होती है, जब विभोर के परिवार से कोई आ जाता है तो वही नियति बाहरी इंसान बन कर रह जाती है।
उसे आज से दस साल पहले की वह शाम याद आने लगी जब वह और विभोर पार्क से टहलते हुए वापस घर की ओर जा रहे थे, वो काफी देर से पैदल चल रहे थे ताकि एक-दूसरे के साथ ज्यादा से ज्यादा वक्त बिता सकें। बातें करते हुए अचानक विभोर ने विषय बदलते हुए कहा...तुम भाई के बारे में तो जानती ही हो कि उनकी कितनी गर्ल फ्रेन्ड्स रह चुकी हैं, कोई गिनती नहीं....पर दीदी के बारे में भी मैं आज तुम्हें बतलाऊँगा....
क्या? क्या उनका भी कोई ब्वाय फ्रेन्ड था?   नियति ने उत्सुकतावश पूछा
हाँ, वो हमारे घर में लीला भाभी आती हैं न.... उनका देवर था। और उससे मिलने के लिए दीदी मुझे यूज करती थी....
मतलब??? नियति के चेहरे पर सवालिया चिह्न साफ दिखाई दे रहे थे।
उसे जब भी मिलना होता सहेली के घर जाने के बहाने मुझे साथ लेकर जाती और मुझे कुछ खाने की चीज देकर बैठा देती और कहती मैं अभी थोड़ी देर में आऊँगी तब तक यहीं रहना कहीं जाना मत। .....एक दिन बैठे-बैठे मुझे काफी देर हो गई तो मैं भी उधर चला गया जिधर उसे जाते देखा था.....और मैंने उन दोनों को  पार्क में घनीझाड़ियों के पीछे अजीब से बैठे देखा.... मैं चुपचाप उसी जगह वापस आ गया और बैठ गया, मुझे बड़ा अजीब लग रहा था तभी दीदी मेरे पास उसके साथ आई मुझे बहलाया-फुसलाया कि मैं घर पर किसी को न बताऊँ और उसके फ्रेन्ड ने मुझे ढेर सारी खाने की चीज दिलवाई। उसके बाद वो कभी मुझसे छिपता नहीं था, दीदी मुझे ले जाती फिर वो मुझे ढेर सारी चीज दिलवाता और मुझे बैठाकर दोनों दूर निकल जाते, मैं एक ही जगह पर बैठा घंटों उन दोनों का इंतजार करता रहता था....बोलते हुए विभोर के चेहरे पर अजीब से घृणा के भाव उभर आए थे।
फिर ये सिलसिला बंद कैसे हुआ?  नियति ने पूछा
वो नीची जाति का था न इसलिए दोनो की शादी को कोई मानता नहीं, इसीलिए दीदी ने उसके साथ भागने का फैसला कर लिया.....
क्या......नियति चौंक पड़ी, वो ऐसा कुछ तो सोच भी नहीं सकती थी
हाँ, और लेटर भी दीदी ने मुझसे ही भिजवाया, पर खेल में लगकर मैं वो लेटर अपने पैंट की जेब में रखकर देना ही भूल गया और वो भाई के हाथ लग गया। भाई ने मुझे भी मारा, दीदी को भी मारा और समझाया कि सिर्फ जाति की बात नहीं है वो लड़का मरीज भी है, इसलिए जानबूझ कर वो अपनी बहन की जिंदगी बर्बाद नहीं करेंगे.... विभोर ने कहा
फिर दीदी मान गईं?   नियति ने उत्सुकतावश पूछा।
मानना पड़ा, वो लड़का छोड़कर भाग जो गया....
विभोर के चेहरे पर गंभीरता और अवसाद के मिले-जुले भाव थे।
लेकिन ये सब बातें तुम मुझे क्यों बता रहे हो?  नियति ने पूछा
क्योंकि मैं चाहता हूँ कि शादी के बाद घर में कोई तुम्हारा अपमान न कर सके, यदि कोई कोशिश भी करे तो तुम्हारे पास उनका जवाब मौजूद हो, मैं तुम्हारा अपमान बर्दाश्त नहीं कर सकता। वह इसप्रकार बोल रहा था जैसे अपने आप को ही आने वाली मुश्किलों से सचेत कर रहा हो।
नियति को अपनी पसंद पर गर्व होने लगा....विभोर कितना चाहता है उसे, कितना सम्मान करता है उसका और सबसे बड़ी बात की वह अपने-आप से जुड़ी कोई भी अच्छी-बुरी, छोटी-बड़ी बात उससे नहीं छिपाता इसीलिए नियति ने मन ही मन यह फैसला कर लिया कि विभोर के परिवार का कोई भी सदस्य उसे कुछ भी कहे परंतु वह विभोर के द्वारा बताई किसी भी बात को अपना हथियार नहीं बनाएगी।
किंतु ज्यों-ज्यों उसकी शादी को कुछ समय बीतने लगा धीरे-धीरे उसे ऐसा लगने लगा कि विभोर उसका होकर भी उसका नहीं, वह उसका पूरा ख्याल रखता है किंतु उसमें इतना साहस नहीं कि वह अपने परिवार वालों के विरोध का या अपशब्दों का सामना उनके समक्ष रहकर कर सके। नियति विभोर के घर वालों की पसंद नहीं थी इसलिए शादी के बाद विभोर उसके साथ अलग किराए के मकान में रहने लगा। दोनों आराम से रह रहे थे कोई परेशानी न होते हुए भी नियति कभी बेफिक्र होकर न जी सकी क्योंकि उसके पति ने उसे समाज और कानून की दृष्टि में तो पत्नी का अधिकार दिया किंतु अपने परिवार और रिश्तेदारों की नजर में वह उसे वह सम्मान न दे सका जो पत्नी होने के कारण उसे मिलना चाहिए था। यह सब वह सहन कर भी लेती यदि उसके पति के कार्यों से उसके दिल को ठेस न पहुँचती.... जब भी उसकी ससुराल में कोई शादी-ब्याह होता, किसी की मृत्यु होती, किसी का जन्म-दिन होता या किसी भी प्रकार का कोई भी आयोजन होता विभोर अवश्य जाता और पूरे आयोजन के दौरान वहीं रहकर एक बेटे और भाई का कर्तव्य पूरा करता परंतु उसे कभी यह अहसास नहीं हुआ कि ऐसी स्थिति में उसकी पत्नी कितना अपमानित महसूस करती होगी और इससे परिवार और रिश्तेदारों के मध्य उसकी छवि धूमिल होती होगी। जब-जब विभोर नियति को इसप्रकार छोड़कर जाता तब-तब नियति अपमान से तिलमिला उठती, अकेले में वह घंटों रोती रहती और सोचती उसने क्यों विभोर से शादी की? अपनी इस दशा के बारे में वह अपने मम्मी-पापा को भी नहीं बता सकती थी क्यों कि विभोर उसकी अपनी पसंद है, न कि मम्मी-पापा की इसीलिए जब वह रो-धोकर शांत होती तो धीरे-धीरे स्वयं को सामान्य करने के लिए खुद को ही समझाने का प्रयास करती कि वह उसके पति के माता-पिता व भाई-बहन हैं, उसपर उनका अधिकार है......फिर सोचती मैं भी तो उसकी अर्धांगिनी हूँ फिर मेरे सम्मान की रक्षा करना क्या उसका कर्तव्य नहीं.......
हर बार विभोर उससे अगली बार न जाने का वादा करता और भाई का फोन आते ही पत्नी और बच्चों की परवाह किए बगैर चला जाता.....
ऐसी घटनाएँ तो अब नियति के लिए आम बात हो चुकी हैं, इतने सालों में वह समझ नहीं पाई कि विभोर का कौन सा चेहरा असली है.......वो जो वह अब देख रही है या फिर वो जो उसने शादी से पूर्व देखा......
क्या यह वही विभोर है जो अपने घर की निजी बातें भी उससे नहीं छिपाता था? और अब अपने घर से जुड़ी छोटी से छोटी बात भी उसे नहीं बताता.....
आज फिर उसी अध्याय का नया पन्ना खुला और उसमें उसे बात करने की मनाही का आदेश दे दिया गया।
अब और अपमान नहीं......नियति ने सोच लिया
क्यों सहूँ मैं अपमान.....बात नहीं करनी न, कोई बात नही.... अब जब बात तक नहीं करनी तो साथ में एक कमरे में रहना क्यों?....
एक कमरे में रहेंगे तो मेरे दिमाग में सवाल भी उठेंगे, फिर जवाब माँगने के लिए बात तो करना पड़ेगा, इसलिए अब से हम अलग-अलग कमरे में ही सोएँगे।
नियति ने विभोर को अपना फैसला सुना दिया.......ठीक है। विभोर ने जवाब दिया।
नियति को दुख तो हुआ परंतु उसे आश्चर्य बिल्कुल नहीं हुआ, वह जानती थी कि उसका वह पति जो कभी उसके लिए अपने परिवार को छोडने को तैयार था आज यदि उसे अपने परिवार के लिए अपनी पत्नी को छोड़ना पड़े तो वह एकबार भी नहीं सोचेगा। लेकिन ऐसी अपमान जनक स्थिति आए उससे पहले मुझे ही यह घर छोड़ देना चाहिए....और नियति अपने बच्चों को लेकर अपनी एक सहेली के घर चली गई तथा उसकी सहायता से नई जॉब ढूँढ़ कर फिर एक फ्लैट किराए पर लेकर रहने लगी।
वैभव ने उसे मनाने का प्रयास किया था परंतु इस बार तो उसने पक्का फैसला कर लिया था इसलिए वह वापस नहीं गई। आज पाँच साल बाद फिर उसका अतीत उसके समक्ष खड़ा था, किंतु उसकी आशाओं के विपरीत। आज इतने सालों में पहली बार उसके मस्तिष्क नें उसके फैसले पर प्रश्न चिह्न लगाया है, वह समझ नहीं पा रही कि उसने जो फैसला उस समय किया वह सही था या नहीं....
नियति के चेहरे पर दृढ़ संकल्प का भाव दिखाई देने लगा..... ऐसा लगा मानो उसने कोई दृढ़ निश्चय कर लिया हो।
सूरज की पहली किरण के साथ ही नियति ने बच्चों को यह बताए बिना कि कहाँ जा रही है, उन्हें साथ लिया और टैक्सी में बैठकर ड्राइवर से बोली- भैया सिविल लाइंस चलो....
वाव ममा पापा के पास जा रहे हैं........ आश्चर्य मिश्रित खुशी थी सनी की आवाज में।
हाँ.........
मालती मिश्रा




4 comments:

  1. अद्भुत कथा सखी! बहुत खूब समझा है स्थितियों को और मानवीय रिश्तों को आने और उन्हें ख़ूबसूरती से ब्यान भी किया है! नमन!

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  2. अद्भुत कथा सखी! बहुत खूब समझा है स्थितियों को और मानवीय रिश्तों को आने और उन्हें ख़ूबसूरती से ब्यान भी किया है! नमन!

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    1. ब्लॉग पर आने के लिए बहुत-बहुत आभार सखी, बहुत दिनों का इंतजार आज पूर्ण हुआ, बहुत सुखद अनुभूति हो रही है, आपकी टिप्पणी के एक-एक शब्द मेरा उत्साहवर्धन करेंगे, सदैव आपकी शुभकामनाओं की अभिलाषा रहेगी।

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    2. ब्लॉग पर आने के लिए बहुत-बहुत आभार सखी, बहुत दिनों का इंतजार आज पूर्ण हुआ, बहुत सुखद अनुभूति हो रही है, आपकी टिप्पणी के एक-एक शब्द मेरा उत्साहवर्धन करेंगे, सदैव आपकी शुभकामनाओं की अभिलाषा रहेगी।

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