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Wednesday, 13 June 2018

कहानी हरखू की

सूरज सिर पर चढ़ आया था लेकिन हरखू और उसका परिवार खेत से घर जाने का नाम ही न ले रहे थे तभी दीना की आवाज आई "अरे हरखू भइया दुपहरी हुई गई काहे धूप में जले जात हो, चलो अब साँझ को आना जूड़े-जूड़े में कर लिहो।"
"हाँ भाई तुम चलौ हम अबहीं आय रहे।" कहकर हरखू फिर खेत की गुड़ाई करने लगा। उसके साथ उसका चौदह वर्ष का बेटा हरीचंद भी कुदाल से खेत को गोड़ कर अपने बाबा का हाथ बँटा रहा था, हरखू की पत्नी बुधिया और 12 वर्ष की बेटी गौरी खुदी हुई मिट्टी से घास निकाल-निकाल कर खेत के एक कोने में ढेरी बना रही थीं ताकि जब वो सारी घास सूख जाएगी तो उसे जला देंगे।
हरखू के पास न बैल थे और न ही इतने पैसे कि वह किराया देकर ट्रैक्टर से खेत की जोताई करवा पाता, इसीलिए उसने ये दो बीघा खेत हाथों से ही खोदने(गोड़ने) का निश्चय किया। इसे गोड़कर घास साफ करके तब सिंचाई करवा कर इसमें सब्जी लगाएगा। सिंचाई के लिए भी तो पैसा चाहिए, सोचकर हरखू दुखी हो गया, फिर सोचा, अब सिंचाई बिना तो सब्जी उगेगी नहीं, जैसे-तैसे करवाना है ही।
प्यास से गला सूख रहा था, थूक सटकते हुए हरखू ने खेत की मेंड़ पर रखी छोटी सी बाल्टी की ओर देखा और बेटी को आवाज लगाते हुए बोला- "गौरी देख बेटा पानी है का? गला सूखा जा रहा है।"
गौरी झट से बाल्टी के पास गई और बाल्टी और गिलास लेकर हरखू के पास गई पानी थोड़ा ही था, बोली- "बाबा लो इसे पी लो हम अबहीं और भरे लाते हैं।" वो बगीचे के कुएँ से पानी भर लाई और पानी पीकर पूरा परिवार फिर काम में लग गया। उनकी काम में तल्लीनता देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा था कि आज ही सारा काम खत्म करना उनकी जिद और मजबूरी है।
दोपहर के दो बज गए चिलचिलाती धूप में काम करते-करते पूरा परिवार बेहाल हो गया तब घर की ओर चल दिए।
"पाँच दिन होइ गए, आज चाहे रात होइ जाय पर काम खतम करे क है, कल सब्जी लगाकर खेतन मा नमी लायक  सिंचाई करवा लिहैं।" हरखू ने कहा।
"पर ए जी सिंचाई के लिए पैसे कहाँ हैं हम लोगन के पास!" पत्नी बोली।
"पैसे तो नाही हैं पर किए बिना तो काम न चलिहै, हाथ पैर जोड़के सिंचाई तो करवान क परिहै। फसल होवे के बाद दै दिहैं।" हरखू मायूसी भरे स्वर में बोला।
जो काम बैलों से दो दिन में, ट्रैक्टर से कुछ घंटों में हो जाता, हरखू इन दोनों के अभाव में वही काम हाथों से लगातार पाँच दिनों से रोज के अट्ठारह घंटे पूरे परिवार के साथ कर रहा है। दो घंटे आराम करके हरखू का परिवार फिर चार बजे से खेत में पहुँच गया और फिर उसी क्रम में खेत की गुड़ाई शुरू कर दिया हरखू या हरीचंद थक कर कुछ देर के लिए बैठ जाते तो उसकी पत्नी और बेटी कुदाल लेकर गोड़ने लगतीं। बाप-बेटे दोनों के हाथों में छाले पड़कर फूट भी चुके थे, फिर भी दोनों हाथों में कपड़ा बाँधकर खेत की सख्त हो चुकी मिट्टी को खोदकर सब्जी उगाने लायक बना रहे थे। हाड़तोड़ मेहनत के बाद रात ग्यारह-साढ़े ग्यारह बजे तक हरखू और उसका परिवार काम पूरा करके घर लौटा। उनके चेहरों पर संतोषजनक थकान नजर आ रही थी।
हरखू के सामने अब एक नया लक्ष्य मुँह बाए खड़ा था। वह सोच रहा था कि प्रधान को सिंचाई के लिए कैसे राजी करेगा। वह मिन्नतें करके मान तो जाएँगे, पर पहले बहुत हीला-हवाली करेंगे। बहुत चिरौरी करनी पड़ेगी, हरखू का आत्मसम्मान भी आहत होगा, पर इसके बिना गुजारा नहीं है। फसल नहीं उगाएँगे तो खाएँगे क्या? बच्चों को पढ़ाएँगे कैसे? रोजमर्रा की जरूरतें कैसे पूरी होंगीं? खुले आसमान के नीचे तारों को देखते हुए उसके दिमाग में ऐसे न जाने कितने ही सवालों के चक्रव्यूह बनते जा रहे थे। हरखू के पास कोई जवाब न था सिवाय इसके कि वह प्रधान की चिरौरी करके उधारी पे सिंचाई करवाए।
अपनी शर्म को घर पर छोड़ हरखू ने मिन्नतें करके जैसे-तैसे खेत की सिंचाई की और पूरे परिवार ने मिलकर खेत में आलू, टमाटर, प्याज और कुछ मौसमी सब्जियाँ भी लगा दिया। बारी-बारी से पूरा परिवार देखभाल करता, दुबारा पानी की आवश्यकता हुई पर अब तो भगवान भी हरखू और उसके परिवार की मेहनत से प्रसन्न हो गए थे इसलिए इंद्रदेव की कृपा से उसे दुबारा सिंचाई के लिए किसी की चिरौरी नहीं करनी पड़ी। जैसे-जैसे सब्जियों की फसल खेत की क्यारियों में फैलती जाती उसकी हरियाली के साथ-साथ हरखू का मन भी हरा होता जाता। अब वह अधिक सावधान रहने लगा था किसी के मवेशी न घुस जाएँ खेत में। कभी कोई मूली खीरा आदि न चुरा ले.... अब हरखू एक पल को भी खेत को बिना निगरानी के न छोड़ता। दोपहर में भी खेत के पास वाले बगीचे में छाँव में खटोली (छोटी चारपाई) डालकर उसी पर लेटे-लेटे खेत पर ही नजर रखता। रात को भी खेत में ही एक कोने में वही खटोली डालकर सोता, जरा सा भी खटका होते ही नींद खुल जाती और जब आस-पास चारों ओर देखकर आश्वस्त हो जाता तब फिर सो जाता। सुबह-शाम शौच, नहाने-धोने व अन्य किसी काम से कहीं जाना होता तो बुधिया को रखवाली के लिए छोड़ जाता। बेटे पर भरोसा नहीं था, बालक बुद्धि है कहीं खेल में लग गया तो?
पूरे परिवार की मेहनत और देखभाल से फसल भी बेजोड़ हुई। हरखू और बुधिया एक-एक सब्जी को बड़े ही प्यार से पोस रहे थे, जिस प्रकार माता-पिता बच्चों को प्यार से पालते-पोसते हैं, उन्हें स्वस्थ देख लोगों की बुरी नजर से बचाते हैं, वैसे ही हरखू और बुधिया अपनी फसल को लेकर डरते थे वे सब्जियों को पुआल से ढँकते, कुछ को पत्तों के नीचे ढँक देते जिससे लोगों की नजर सीधे सब्जियों पर न पड़े।
इस बार फसल इतनी अच्छी थी कि हरखू की सारी परेशानी दूर हो जानी थी, प्रधान का कर्जा भी चुकता हो जाएगा और भगवान ने चाहा तो इस बार  बैलों का एक जोड़ा खरीद लेगा फिर उसे परिवार के साथ हाथ से गुड़ाई नहीं करनी पड़ेगी।
"अरे हरखू भैया कुछ सुना? प्रधान कह रहे थे कि सरकार के खिलाफ किसान आंदोलन शुरू हुइ गवा है, तो कोई किसान अपना फल, सब्जी और दूध मंडी में नाहीं बेचेगा।" दयाल ने हरखू को खेत से सब्जी तोड़ते देखकर कहा।
"का कहि रहे हो भइया, अइसा कइसे होइ सकत है, अगर हम मंडी में बेचेंगे नाहीं तो हमार काम कइसे चलिहै?" हरखू की मानो किसी ने साँस रोक दी हो।
"भइया सही कहि रहे हो, हमने तो जो सुना वही बता दिए, हम लोगन को का लेना-देना ई आंदोलन-वांदोलन से, हम अपना काम करि रहे, हमें कुछ नाही चाहिए सरकार से।" दयाल ने कहा।
"हाँ भइया जिसे जो करना होय करे, हमें कोई मतलब ना है इन सब बातन से।" कहते हुए हरखू सब्जी तोड़ने लगा, उसे सवेरे सब्जी लेकर मंडी जाना था इसलिए जितनी सब्जियाँ वह ले जा सकता था उतनी तोड़ लेना चाहता था।
हरखू अपने बेटे हरीचंद के साथ बड़ी-बड़ी दो टोकरियों को सब्जियों से भरकर सुबह मुँह अंधेरे ही मंडी के लिए निकल गया था। बुधिया बची हुई सब्जियों की मिट्टी साफ करके दूसरी टोकरी में सजा रही थी कि हरखू जब आएगा तो इन्हें भी पास में लगने वाले बजार में जाकर बेच आएगा। तभी हरखू और हरीचंद आ गए। बाल अस्त-व्यस्त, पसीने से तर-बतर, आँखें लाल-लाल हो रही थीं, हरखू की कमीज़ कंधे से फटकर लटक रही थी।
"अरे, ये का हुआ? कैसी दशा बनाए हो ई तुम दोनों?" कहती हुई बुधिया दौड़ी।
हरखू धड़ाम से निढाल होकर वहीं जमीन पर बैठ गया और सिर पकड़ कर फफक कर रो पड़ा। हरीराम भी वहीं बैठकर रोने लगा।
"अरे काहे रोय रहे हो तुम दोनो़ कुछ तो बतावो, हमार जी बइठा जा रहा है।" बुधिया ने घबराकर पूछा। बाबा और भाई को रोते देख गौरी भी खुद को संभाल न सकी वह भी वहीं बैठकर रोने लगी।
"हम बर्बाद होइ गए हरी की माँ, ई किसान आंदोलन ही हम किसानों की जान की दुश्मन होय गई है, अरे हमें का लेना-देना ई सबसे, लेकिन नाहीं, ई नेता लोगन अपने-अपने गुंडा छोड़ रक्खे हैं, जबरजस्ती हम लोगन के सब्जी, फल सब छीनके सड़कन पर फेंक रहे हैं और हमें धमका के मारपीट के भेज दिये।" हरखू कहते-कहते बिलख कर रोने लगा। उसे अपनी सारी जरूरतें सारे सपने किसान आंदोलन की भेंट चढ़ते दिखाई दे रहे थे।
"हे भगवान अब हम लोग का करेंगे, अगर ऐसे ही कुछ दिल चलत रहा तो हम लोगन के तो सारी फसल, सारी लागत बर्बाद होइ जाई, कर्जा कहाँ से चुकाएँगे, मर जाएँगे हम तो।"  कहते हुए बुधिया बिलख-बिलख कर रोने लगी। जहाँ कुछ देर पहले खुशियाँ और आशाएँ और आने वाले दिनों कों लेकर उत्साह और सुनहरे स्वप्न थे वहाँ अब मातम का माहौल था।
मालती मिश्रा✍️

2 comments:

  1. कहानी अच्छी है,पर थोड़ी और कसावट लाइये

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    1. जरूर प्रयास करेंगे

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