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Tuesday, 5 June 2018

आखिरी रास्ता

सूर्य अस्तांचल की ओर जा रहा था और गाड़ी विपरीत दिशा में भागी जा रही थी। घूँघट में सहमी सिकुड़ी सी कमला अपने सपनों की दुनिया छोड़ एक ऐसी दुनिया बसाने जा रही थी जिसकी उसने कल्पना भी नहीं की थी। ऐसे अनचाहे भविष्य के लिए उसके सपनों की बलि दे दी गई थी, इसीलिए आज ससुराल जाते हुए उसे माँ-बाबा व परिवार के अन्य सदस्यों के लिए दुख नहीं हुआ। वह विदाई के समय रोई नहीं सिर्फ गले लगी और चल दी अपनी बलिबेदी की ओर। उसे अब भी याद है वो दिन..... जब सोचते हुए कमला अतीत की गहराई में डूबती चली गई.....

अभी सुबह के ग्यारह-बारह बजे होंगे लेकिन जेठ का महीना है, गर्मी अपने चरमोत्कर्ष पर है। इस समय भी धूप ऐसी चिलचिलाती हुई महसूस हो रही थी मानो सूर्यदेव शोले बरसा रहे हों। गेहूँ के फसल की कटाई हो चुकी थी, दवनी करके अनाज भी सबके घरों में आ चुके थे, तो खेत-खलिहान सब खाली हो चुके थे। दूर-दूर जहाँ तक नजर जाती खाली खेतों के आर-पार सिवाय चमकती धूप के कुछ भी नजर न आता, हाँ गाँव के पश्चिम दिशा में जरूर बीच-बीच में कहीं-कहीं इक्का-दुक्का खेतों में लहलहाते गन्ने  नजरों को अवरुद्ध कर रहे थे।
इतनी तेज धूप में लोग या तो घरों में या फिर घरों के बाहर घने पेड़ों की ठंडी छाया में बैठे मिलते, लगभग सभी घरों के पुरुष इस समय गाँव के बाहर पश्चिम की ओर चार-पाँच बड़े-बड़े पेड़ वाले छोटे से बगीच में तथा कुछ गाँव के उत्तर दिशा मे इसी तरह के एक छोटे बगीचे में बैठकर गप-शप या ताशबाजी करते। बहुत से पुरुष, युवा और बच्चे तो गाँव से पश्चिम दिशा की ओर कुछ दूरी पर उस बड़े और घने बगीचे में ही सुबह से शाम तक पूरा दिन गप-शप करते, तरह-तरह के खेल खेलते हुए बिता देते, जो गाँव वालों का साझा था। गर्मी से बचने का इससे अच्छा साधन कुछ नहीं था।
रोज की यही दिनचर्या थी , लेकिन आज कमला को घर का माहौल कुछ बदला सा महसूस हो रहा था, घर की औरतों में कुछ ऐसी सुगबुगाहट महसूस हो रही थी जो कमला की उत्सुकता को बढ़ा रही थी। उसने देखा कि माँ शरबत बना रही हैं घर में नींबू नहीं था तो किसी पड़ोसी के घर से माँग कर लाईं, शरबत के साथ भूजा (चावलों को रेत में भूनकर बनाए गए मुरमुरे) लेकर दादी को भेजा फिर खुद भी पीछे-पीछे गईं, और घर के दाईं ओर जो पड़ोस का घर है, उस घर के सामने छोटा सा बगीचा है, कमला का घर उस घर के पीछे की ओर है। उसी बगीचे में शायद कोई मेहमान हैं, पर मेहमान हैं तो घर पर क्यों नहीं आए? कमला के मस्तिष्क में सवाल कौंधा, फिर हर बार जब भी कोई मेहमान आते तो आवभगत की सारी तैयारी तो कमला ही करती थी पर आज तो उससे किसी ने कुछ कहा ही नहीं उलटा छिपाने का प्रयास करते दिख रहे हैं। वो माँ के पीछे-पीछे चुपचाप जाने लगी तो माँ ने रोक दिया-
"कहाँ जा रही हो? घर में कोई नहीं है, घर में रहो।"
वह वहीं बरामदे के कोने पर ही रुक गई और माँ को जाते हुए देखती रही, वहाँ से मेहमान तो दिखाई नहीं दे रहे थे शायद वो बगीचे में यहाँ से काफी दूरी पर बैठे थे। कमला ने देखा माँ पड़ोसी के बरामदे में ईंटों से बने खंभे की आड़ में खड़ी हो गईं और पड़ोस की ही महिला (जिन्हें कमला बड़ी माँ बोलती थी) ने दादी के हाथ से शरबत और भूजा ले लिया और लेकर बगीचे में उस ओर बढ़ गईं जहाँ दो चारपाइयों पर कुछ पुरुष बैठे थे, कमला के बाबा भी, उनमें थे एक-दो लोगों को वह पहचानती भी नहीं, वह चुपचाप वापस घर के भीतर आ गई। अब उसे कुछ-कुछ शुबहा होने लगी कि शायद ये उसकी ससुराल से आए हुए मेहमान हैं।
उसके गाँव की यही रीत है कि समधन अपने समधी के सामने नहीं जा सकती, शायद इसीलिए माँ छिप रही थीं। पर वो क्यों आए होंगे? उसकी शादी को कितने साल हो गए उसे खुद याद नहीं पर अभी तक गौना नहीं हुआ है और अभी होना भी नहीं फिर क्यों आए, इन्हीं सवालों में डूबती-उतराती उसे नींद आ गई।

कुछ लोगों की मिली जुली अस्पष्ट सी आवाजें उसको बहुत दूर से आती हुई लग रही थीं, वो आपस में एक दूसरे से झगड़ रहे थे या बात कर रहे थे कुछ भी स्पष्ट सुनाई नहीं पड़ रहा था। कमला बार-बार सुनने का प्रयास करती लेकिन वह जितना कोशिश करती आवाजें उतनी ही दूर होती जातीं। तभी माँ की अस्फुट सी आवाज आई शायद वो कह रही थीं- "लेकिन गौना अभी कैसे कर सकते हैं?" "गौना" यह शब्द सुनते ही कमला हड़बड़ाहट में उठ बैठी...अब उसे महसूस हुआ कि वह कच्ची नींद में ही उन आवाजों को सुन रही थी जो उसे समझ नहीं आ रही थीं। अब वह चुपचाप लेटकर सबकी बातें सुनने लगी। उसे ज्ञात हुआ कि उसके ससुर गौना की तारीख तय करने आए थे और उसके बाबा ने प्रस्ताव मान लिया था।
कमला की आँखों से आँसू छलक आए वह तो अभी पढ़ना चाहती थी, उसने अपनी इच्छा माँ-बाबा को भी बताई थी, फिर क्यों बाबा ने उसकी बात नहीं मानी। बाबा के सामने वैसे तो उसकी हिम्मत न होती थी कि उनके फैसले के विरुद्ध वह मुँह खोले पर आज बात उसके पूरे जीवन की है। ज्यादा से ज्यादा क्या होगा डाँटेंगे कोई बात नहीं, अगर वो मुझे दो थप्पड़ भी लगा दें फिर मेरी बात मान लें तो भी मैं सहने को तैयार हूँ, ऐसा सोचकर वह बरामदे में आ गई जहाँ माँ-बाबा, दादी और चाचा-चाची बैठे थे। "बाबा!" उसने पुकारा।
"हाँ, बोलो!" बाबा ने कहा
"मुझे अभी पढ़ना है।"
"दसवीं तक पढ़ा दिया, चिट्ठी-पत्री लिख लेती हो अब कौन सी तुमसे नौकरी करवानी है जो आगे पढ़ोगी?" बाबा ने कहा।
कमला को आश्चर्य हुआ कि बाबा ने डाँटा नही जैसा कि उसे उम्मीद थी, अब उसका साहस और बढ़ा उसने कहा- "बाबा दसवीं से क्या होता है, मुझे तो बी०ए० करना है।" वह आगे कहना चाहती थी कि उसका गौना-वौना न करवाएँ पर वह साहस न कर सकी, तभी दादी बोल पड़ीं- "यहाँ हम गौने का दिन तय कर रहे हैं और तुम जिंदगी भर पढ़ना चाहती हो, बहुत पढ़ चुकीं, हमारे गाँव में कोई लड़की इतना नही पढ़ती, चलो अंदर जाओ।"
अपनी बेबसी पर कमला की आँखें भर आईं वह आँसू पोछती हुई भीतर चली गई। उसका मन कर रहा था कि वह खुद बगीचे में चली जाए और मेहमानों से कह दे कि वह अभी पढ़ना चाहती है तो गौना के लिए वो लोग पाँच साल बाद आएँ, पर उसे अपने बाबा के सम्मान की भी परवाह थी। बार-बार माँ यही सिखाया करती थीं कि बेटा कोई ऐसा काम मत करना जिससे तुम्हारे बाबा का सिर झुके।
जैसे-जैसे दिन बीतता जाता कमला की बेचैनी बढ़ती जा रही थी, वह क्या करे, कैसे समझाए सबको? उसका मन बगावत करने लगा...नहीं मैं नहीं जा सकती ससुराल, मुझे कुछ तो करना होगा, सोचती हुई वह कमरे में इधर से उधर टहल रही थी तभी माँ ने कहा- "ये टोकरी वाला चिड़वा एक थैले में, दूसरे में भूजा रख दो। तब तक मैं बाकी सामान रख रही हूँ।" कमला के दिमाग में बिजली सी कौंध गई उसने झट से एक चिट्ठी लिख डाली अपने ससुर के लिए कि वह अभी गौना नहीं चाहती। और चिड़वे के बीच में रख दिया। उसने सोचा था कि उसके ससुर शायद उसकी भावनाओं को समझ सकें और स्वयं गौना कुछ सालों के लिए टाल दें तो बाबा को पढ़ाने के लिए मना लेगी।
 माँ-बाबा बहुत देर के गए हुए हैं अब तक तो मेहमान भी जा चुके होंगे, फिर अब तक आए क्यों नहीं? कहीं उसकी चिट्ठी बाबा के हाथ तो नहीं लग गई, सोचते ही उसके बदन में झुरझुरी सी दौड़ गई। तभी बाहर से बोलने की आवाजें आने लगीं वह समझ गई कि सभी आ चुके हैं। वह गिलास में पानी डाल रही थी कि सबको बाहर ले जाकर देगी तभी माँ आईं और उसको बाजू से पकड़कर लगभग घसीटते हुए दूसरे कमरे में ले गईं । और दबी आवाज में फुँफकार कर बोलीं- "क्या किया तूने कुछ पता भी है? तू चिट्ठी भेज रही थी?"
कमला के पैरों तले मानो जमीन निकल गई फिर अगले ही पल वह संभलते हुए बोली-
"पर माँ मैंने आप लोगों से भी तो कहा था आप लोग ही नहीं माने तो मेरे पास और कोई रास्ता नहीं बचा।"
"रास्ता नहीं बचा...तेरे बाबा को पता चलता न तो आज ही तुझे जमीन में गाड़ देते, वो तो अच्छा है कि मैंने देख लिया।" माँ दाँत पीसती हुई बोलीं।
कमला ने राहत की सांस ली कि बाबा को पता नहीं चला पर अगले ही पल वह निढाल होकर वहीं धम्म से बैठ गई जब उसे यह अहसास हुआ कि अब उसका आखिरी रास्ता भी बंद हो गया।
#मालतीमिश्रा, दिल्ली

2 comments:

  1. बहुत मार्मिक कथा है प्रिय मालती जी | सचमुच अनगिन लडकियों के सपने ऐसे ही ध्वस्त हुए हैं | कमला ने तो फिर भी दसवीं कर ली जहाँ से अनेक रास्ते खुलते हैं कई लडकियाँ तो स्कूल का मुंह ही देख नहीं पाती |सस्नेह --

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    1. अपनी अनमोल प्रतिक्रिया से अवगत कराकर मेरी लेखनी को बल देने के लिए आ० आभार रेनू जी
      🙏🙏

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