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Saturday, 9 June 2018

मन में उमंगें छाएँ मन हुलसा सा जाए
काली रात बीती छाई अरुण की लाली है।।

फुनगी पे ओस कण मोती से दमक रहे
जी भर के रोई मानो जाती रात काली है।।

हरी-हरी चूनर पे कुसुम के मोती सजे
देख दिनेश धरा ने चुनरी संभाली है।।

कुसुम कुमुदिनी पे मधुप गुंजार करे
कुहुक कुहू कोयल गाए मतवाली है।।

मालती मिश्रा, दिल्ली

4 comments:

  1. वाह!!बहुत खूब।

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    1. शुभा जी बहुत-बहुत आभार

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  2. आकर्षक चित्र उससे भी मनोहारी शब्दचित्र -- सस्नेह प्रिय मालती जी |

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    1. रेनू जी ब्लॉग पर उपस्थित होकर स्नेहमयी वाणी से सिंचित कर बरबस ही मन जीत लिया आपने।🙏

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