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Thursday, 1 September 2016

उदय सिंधु से अस्त सिंधु तक

सकल दिवा के अनवरत सफर से
थककर दिनेश चला सिंधु के अंक में
शांत सिंधु के अविरल निर्मल नीर में
अब भी प्रकाशित दिनकर का भाल है
अंबर का वसन मटमैला हो चला
पर कंचन आभा अब भी बेमिसाल है
उदधि थाल में प्रकाशित लौ सूर्य की
लहर-लहर लहरों की अद्भुत ये चाल है
उदय सिंधु से अस्त सिंधु तक
संध्या ने ओढ़ा स्वर्णिम सी शॉल है
दिनकर के प्रीत से कुछ रंग ले चली 
जल में बह रही नौका उड़ रहा पाल है
आड़ी-टेढ़ी जैसे-तैसे लहरों संग हिलकोरें लेती
बढ़ती चली जा रही नैया की मदमस्त चाल है
विस्तृत वितान तले जलराशि अपार है
चला तन्हा अकेले मन में अनेकों सवाल है
अनुपम सौंदर्य की छटा लाई संध्या सुंदरी
प्रकृति को लुभाने को बिछाया ये जाल है
मालती मिश्रा

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